भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना-नवल
भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना - नवल (सरसों के खेत में -रंगाला ) Pic. Credit : Aidan Dehru किसी व्यक्ति की उपस्थिति मात्र से होने वाला दुःख वास्तव में उस विसंगति की उपज है, जो हमारी अपेक्षा और जमीनी वास्तविकता के बीच गहरी खाई बनकर खड़ी हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक त्रासदी है कि कभी-कभी कोई व्यक्ति उस स्थान या पद को सुशोभित करने लगता है, जिसके वह सर्वथा अयोग्य है। वह स्थान उसके लिए बना ही नहीं था, फिर भी वह वहां विद्यमान है। अक्सर ऐसी स्थितियां किसी ठोस योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रम, क्षणिक उन्माद या केवल एक प्रभावशाली अफवाह के सहारे निर्मित होती हैं। उस दौर में, जब वह निर्णय लिया गया था, शायद जनमानस की चेतना सुप्त थी या उनमें उस दूरदर्शिता का अभाव था जो भविष्य के परिणामों को भांप सके। लोगों ने एक मुखौटे को चेहरा समझ लिया और उस झूठ को सत्य मानकर सिंहासन पर बैठा दिया। आज जब समय का चक्र घूमा है और सत्य की प्रखर धूप ने उस भ्रम के कोहरे को छाँट दिया है, तब वह चेहरा अपनी पूरी नग्नता और अयोग्यता के साथ सामन...