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जो शेष रह जाए

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जो शेष रह जाए - नवल जाणी         ('जो शेष रह जाए' का अंश) नवल जाणी जी की ये पंक्तियाँ प्रेम, अनन्यता और पूर्ण आत्म-समर्पण की एक बेहद सुंदर और भावुक अभिव्यक्ति हैं। इन पंक्तियों में कवि अपने जीवन की सबसे गहरी और अंतिम अभिलाषा को व्यक्त करते हैं, जहाँ वे संसार की नश्वरता और प्रेम की अमरता के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं।            कवि का मानना है कि इस भौतिक संसार की हर वस्तु, चाहे वह धन-दौलत हो, सफलता हो, आकर्षण हो या फिर यह शरीर स्वयं हो, समय के साथ समाप्त हो जानी है। ऐसे में, जब इस जगत् का सब कुछ नष्ट होने लगे या मिट जाए, तब भी यदि उनके पास कोई एक चीज़ शेष बचनी चाहिए, तो वह केवल उनके प्रिय का साथ होना चाहिए। यहाँ 'साथ' केवल किसी व्यक्ति की शारीरिक उपस्थिति नहीं, बल्कि वह आत्मिक जुड़ाव, भरोसा और अहसास है जो हर स्थिति के पार भी बना रहता है।             इन पंक्तियों में 'अपघटित' शब्द का प्रयोग बहुत ही अर्थपूर्ण और अनूठा है। अपघटन का अर्थ होता है किसी चीज़ का अपने मूल तत्त्वों मे...

भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना-नवल

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भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना - नवल        (सरसों के खेत में -रंगाला )     Pic. Credit : Aidan Dehru किसी व्यक्ति की उपस्थिति मात्र से होने वाला दुःख वास्तव में उस विसंगति की उपज है, जो हमारी अपेक्षा और जमीनी वास्तविकता के बीच गहरी खाई बनकर खड़ी हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक त्रासदी है कि कभी-कभी कोई व्यक्ति उस स्थान या पद को सुशोभित करने लगता है, जिसके वह सर्वथा अयोग्य है। वह स्थान उसके लिए बना ही नहीं था, फिर भी वह वहां विद्यमान है। अक्सर ऐसी स्थितियां किसी ठोस योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रम, क्षणिक उन्माद या केवल एक प्रभावशाली अफवाह के सहारे निर्मित होती हैं। उस दौर में, जब वह निर्णय लिया गया था, शायद जनमानस की चेतना सुप्त थी या उनमें उस दूरदर्शिता का अभाव था जो भविष्य के परिणामों को भांप सके। लोगों ने एक मुखौटे को चेहरा समझ लिया और उस झूठ को सत्य मानकर सिंहासन पर बैठा दिया। आज जब समय का चक्र घूमा है और सत्य की प्रखर धूप ने उस भ्रम के कोहरे को छाँट दिया है, तब वह चेहरा अपनी पूरी नग्नता और अयोग्यता के साथ सामन...

भीतर की कुंडी: एक छोटी-सी रोशनी का अनुभव

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भीतर की कुंडी: एक छोटी-सी रोशनी का अनुभव       (बाजरे के खेत में, नागड़दा 2025) जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हमारा मन किसी बंद दरवाज़े की तरह जड़ हो जाता है। हम बाहर की दुनिया को कठिन, अप्रिय या असंभव समझने लगते हैं। पर सच तो यह है कि दरवाज़ा बाहर से नहीं, भीतर से बंद होता है। और वहीं कहीं, हमारे ही मन की तहों में, एक अदृश्य-सा हाथ—शायद अनुभव, शायद समय, शायद कोई सुकून भरा विचार—धीरे से उस कुंडी को खोल देता है। यही वह क्षण होता है जब अचानक सब कुछ पहले जितना भारी नहीं लगता। दुनिया वैसी ही रहती है, लेकिन उसे देखने का हमारा दृष्टिकोण बदल जाता है। हम समझते हैं कि कठिनाइयाँ अक्सर बाहर नहीं, हमारे भीतर बनाई गई दीवारों में रहती हैं। भीतर की कुंडी खुल जाए, तो रास्ते अपने आप सरल दिखने लगते हैं। शायद जीवन बस इतना ही चाहता है—हम थोड़ा-सा भीतर झाँक लें। Naval Jani

भूली हुई आवाज़ें

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“भूली हुई आवाज़ें”     मैं पिताजी के साथ (2017)    (फोटो नागड़दा के तारामीरा की फसल के खेत में ) कोई समाज या जाति अपनी स्मृतियों — यानी अपने संघर्ष, पीड़ा, इतिहास और सच्चाई — को भूल जाती है, तो उसका अतीत धूल बनकर आने वाले समय की आँखों में चला जाता है। यानी, इतिहास की भूलें भविष्य को अंधा कर देती हैं। फिर वही राजनीतिक दिखावे, वही खोखले भाषण और झूठे वादे दोहराए जाते हैं, और लोग भ्रम में रहते हैं कि केवल नारों से परिवर्तन आ जाएगा। भूल जाना मनुष्य की सबसे कोमल, पर सबसे घातक आदत है। क्योंकि जब हम अपना सच्चा इतिहास, अपनी पीड़ा और अपनी पहचान भूल जाते हैं — तब हम अपने अस्तित्व से दूर हो जाते हैं। जिस दिन हम अपने सच को, अपने इतिहास को याद रखना शुरू कर देंगे — उसी दिन हम फिर से जाग्रत, संवेदनशील और सच्चे मनुष्य बन जाएँगे। Naval Jani

क्षणिकता और स्थायित्व

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क्षणिकता और स्थायित्व     (In the millet field) फूलों के बीच खड़ा एक पत्ता मुझे हमेशा यह सिखाता है कि निकटता का अर्थ अपनापन नहीं होता। फूलों की चमक और सुगंध मोहक ज़रूर है, पर वह क्षणिक है, उतनी ही क्षणिक जितनी किसी उत्सव की रोशनी। पत्ता जानता है कि उसका जीवन किसी और की आभा पर नहीं टिका, बल्कि उस गहरी मिट्टी पर टिका है, जहाँ से उसकी हरियाली जन्म लेती है। यही कारण है कि फूल के झर जाने पर भी उसकी हरियाली बनी रहती है, क्योंकि उसका संबंध क्षणभंगुर शोभा से नहीं, बल्कि वृक्ष की जड़ों से है। मुझे लगता है जीवन भी ऐसा ही है। दूसरों की निकटता से मिलने वाला गौरव टिकाऊ नहीं होता। जो टिकता है, वह है हमारी अपनी पहचान, हमारे भीतर का सत्य, वह नमी जो हमें जड़ों से जोड़ती है। शायद आत्मसम्मान का सबसे बड़ा रूप यही है—भीड़ के बीच रहते हुए भी अपने हरेपन को बचाए रखना। ~Naval Jani 

परपीड़ा में सुख -नवल

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परपीड़ा में सुख "मैं जब अपने दुख की  गाँठ खोलता हूँ, तो कुछ सुख अनजाने में  किसी और तक पहुँच जाते हैं ।" *** *** दूसरे का दुःख, कई बार श्रोता के भीतर एक गुप्त सुख की अनुभूति करा देता है। यह सुख सहानुभूति से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उस तुलना से आता है जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि "कम से कम मैं तो इससे बेहतर हूँ।" जब कोई अपनी पीड़ा साझा करता है, तो वह यह सोचकर करता है कि शायद उसे कोई समझेगा, सुनेगा, कुछ कहेगा जो सही हो। लेकिन कई बार सुनने वाला उस दुःख को एक दृश्य की तरह देखता है– कला, अभिनय या समाचार की तरह–जहाँ वह भीतर से संतुष्ट होता है कि उसका जीवन कम टूटा हुआ है। ऐसी स्थितियाँ बताती हैं कि समाज में करुणा का स्थान धीरे-धीरे आत्मतुष्टि ने ले लिया है। अब हम दुख सुनते नहीं, निहारते हैं–और उसी क्षण, दुःख का साझा करना आत्मीयता नहीं, एक एकांतिक मंच बन जाता है। यही सबसे करुण सच्चाई है – दुःख की गाँठ खुलती है, और कोई और मुस्कुरा उठता है।  ~ नवल जाणी

मेरी चुप्पी -(अनकही बातें)

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  मेरी चुप्पी -कविता  (अनकही बातें -काव्य संग्रह)  कवि : नवल जाणी  भावार्थ: इस कविता में कवि ने "चुप्पी" को एक गहरे भाव और आत्मसंयम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते है कि उन्होंने चुप रहना सीख लिया है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र अपनी गहराइयों में कई रहस्य छुपा कर रखता है। यह चुप्पी किसी कमजोरी का परिणाम नहीं, बल्कि एक समझदारी और आत्मनियंत्रण की अभिव्यक्ति है। कवि कहते हैं कि वह देखता, सुनता और समझता भी है, परंतु अपने शब्दों को तालों में बंद कर देता है क्योंकि हर सत्य हर किसी के लिए नहीं होता। यह संकेत करते है कि सभी लोग सत्य को ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखते और हर बात सबके सामने कह देना उचित नहीं होता। कवि यह भी जानते हैं कि कौन व्यक्ति कितना गहरा है और कौन केवल सतह पर तैरता हुआ दिखावा कर रहा है। यानी, वे लोगों की गहराई, सच्चाई और उनके दिखावे को पहचानते हैं। अंत में वे स्पष्ट करते हैं कि उनकी चुप्पी कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि यह एक इंतज़ार है — उस क्षण का जब वक़्त के पानी का बहाव थोड़ा ठहर जाए, और सच्चाई को समझने योग्य माहौल बन जाए। कविता "मेरी ...