भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना-नवल
भ्रम का सिंहासन और जागृत चेतना - नवल
Pic. Credit : Aidan Dehru
किसी व्यक्ति की उपस्थिति मात्र से होने वाला दुःख वास्तव में उस विसंगति की उपज है, जो हमारी अपेक्षा और जमीनी वास्तविकता के बीच गहरी खाई बनकर खड़ी हो जाती है। यह एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक त्रासदी है कि कभी-कभी कोई व्यक्ति उस स्थान या पद को सुशोभित करने लगता है, जिसके वह सर्वथा अयोग्य है। वह स्थान उसके लिए बना ही नहीं था, फिर भी वह वहां विद्यमान है। अक्सर ऐसी स्थितियां किसी ठोस योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि एक सुनियोजित भ्रम, क्षणिक उन्माद या केवल एक प्रभावशाली अफवाह के सहारे निर्मित होती हैं। उस दौर में, जब वह निर्णय लिया गया था, शायद जनमानस की चेतना सुप्त थी या उनमें उस दूरदर्शिता का अभाव था जो भविष्य के परिणामों को भांप सके। लोगों ने एक मुखौटे को चेहरा समझ लिया और उस झूठ को सत्य मानकर सिंहासन पर बैठा दिया।
आज जब समय का चक्र घूमा है और सत्य की प्रखर धूप ने उस भ्रम के कोहरे को छाँट दिया है, तब वह चेहरा अपनी पूरी नग्नता और अयोग्यता के साथ सामने खड़ा है। भ्रम का पर्दा उठना ही सबसे बड़ी पीड़ा का कारण बनता है क्योंकि यह न केवल सामने वाले की असलियत उजागर करता है, बल्कि स्वयं की मूर्खता और विवेकहीनता का आइना भी दिखाता है। यह पश्चाताप की वह अग्नि है जिसमें व्यक्ति और समाज दोनों झुलसते हैं। यह सोचना कि "हमने इसे पहचाना क्यों नहीं" एक अंतहीन मानसिक प्रताड़ना बन जाता है। सबसे भयावह पहलू यह है कि क्या हमारी वह एक पुरानी चूक अब एक स्थायी अभिशाप बन चुकी है। क्या एक बार की गई भूल उस अयोग्य व्यक्ति को उस स्थान पर हमेशा के लिए जड़ कर देगी? यह विचार कि जिसे हम एक अस्थाई प्रयोग या सही चुनाव समझ रहे थे, वह अब एक ऐसी चट्टान बन चुका है जिसे हिलाना असंभव प्रतीत होता है, किसी बुरे सपने जैसा लगता है।
समाज अक्सर अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय उन्हें ढोने का अभ्यस्त हो जाता है, और यही वह बिंदु है जहाँ वह 'गलती' स्थायित्व प्राप्त कर लेती है। जब लोगों की आँखें खुलती हैं, तो वे खुद को एक ऐसे चक्रव्यूह में पाते हैं जहाँ प्रवेश तो उनकी अपनी मर्जी या भ्रम से हुआ था, पर निकास का मार्ग उनकी क्षमता से बाहर नजर आता है। यह स्थिति केवल एक व्यक्ति के वहां होने का दुःख नहीं है, बल्कि उस स्थान की गरिमा के पतन और न्याय की हार का दुःख है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि कोई भी भ्रम अमर नहीं होता और न ही कोई गलती इतनी बड़ी होती है कि उसे सुधारा न जा सके। जागृति भले ही देर से आई हो, लेकिन यह इस बात का प्रमाण है कि चेतना अभी जीवित है। जिस दिन समाज अपनी सामूहिक भूल को बिना किसी अहंकार के स्वीकार कर लेता है, उसी दिन से उस 'अस्थाई' को हटाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जिसे वह अब तक अपनी मजबूरी मानकर ढो रहा था।
अंततः, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि किसी अयोग्य का ऊँचे स्थान पर होना केवल उस व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक परख की विफलता है। जब आँखें खुलती हैं और भ्रम का वह चमकदार पर्दा गिरता है, तो अपराधबोध होना स्वाभाविक है, परंतु इस ग्लानि को अनंत काल तक ढोना समाधान नहीं है। सत्य का साक्षात्कार भले ही विलंब से हुआ हो, लेकिन यह जागृति ही उस अशुद्धि को दूर करने का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण है। कोई भी व्यवस्था या व्यक्ति तब तक स्थायी नहीं होता, जब तक उसे जनमानस की मूक स्वीकृति प्राप्त होती रहे। जिस क्षण समाज अपनी दूरदर्शिता की कमी को स्वीकार कर आत्म-सुधार का संकल्प लेता है, उसी क्षण उस 'गलत' के आधार हिलने लगते हैं। पश्चाताप का वास्तविक अर्थ हाथ मलकर बैठना नहीं, बल्कि उस चेतना को इतना प्रखर बनाना है कि भविष्य में कोई भी और 'सुनियोजित भ्रम' हमारी विवेकशीलता को बंधक न बना सके। हमारी एक पुरानी गलती हमें तब तक स्थायी रूप से प्रताड़ित नहीं कर सकती, जब तक हम उससे सीखने और उसे बदलने का साहस जीवित रखते हैं। यह जागृति ही वह मशाल है जो अंततः अयोग्यता के अंधकार को मिटाकर न्याय और योग्यता की पुनर्स्थापना करती है।
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