मेरी चुप्पी -कविता (अनकही बातें -काव्य संग्रह) कवि : नवल जाणी भावार्थ: इस कविता में कवि ने "चुप्पी" को एक गहरे भाव और आत्मसंयम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते है कि उन्होंने चुप रहना सीख लिया है, ठीक वैसे ही जैसे समुद्र अपनी गहराइयों में कई रहस्य छुपा कर रखता है। यह चुप्पी किसी कमजोरी का परिणाम नहीं, बल्कि एक समझदारी और आत्मनियंत्रण की अभिव्यक्ति है। कवि कहते हैं कि वह देखता, सुनता और समझता भी है, परंतु अपने शब्दों को तालों में बंद कर देता है क्योंकि हर सत्य हर किसी के लिए नहीं होता। यह संकेत करते है कि सभी लोग सत्य को ग्रहण करने की क्षमता नहीं रखते और हर बात सबके सामने कह देना उचित नहीं होता। कवि यह भी जानते हैं कि कौन व्यक्ति कितना गहरा है और कौन केवल सतह पर तैरता हुआ दिखावा कर रहा है। यानी, वे लोगों की गहराई, सच्चाई और उनके दिखावे को पहचानते हैं। अंत में वे स्पष्ट करते हैं कि उनकी चुप्पी कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि यह एक इंतज़ार है — उस क्षण का जब वक़्त के पानी का बहाव थोड़ा ठहर जाए, और सच्चाई को समझने योग्य माहौल बन जाए। कविता "मेरी ...
परपीड़ा में सुख "मैं जब अपने दुख की गाँठ खोलता हूँ, तो कुछ सुख अनजाने में किसी और तक पहुँच जाते हैं ।" *** *** दूसरे का दुःख, कई बार श्रोता के भीतर एक गुप्त सुख की अनुभूति करा देता है। यह सुख सहानुभूति से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि उस तुलना से आता है जिसमें व्यक्ति यह अनुभव करता है कि "कम से कम मैं तो इससे बेहतर हूँ।" जब कोई अपनी पीड़ा साझा करता है, तो वह यह सोचकर करता है कि शायद उसे कोई समझेगा, सुनेगा, कुछ कहेगा जो सही हो। लेकिन कई बार सुनने वाला उस दुःख को एक दृश्य की तरह देखता है– कला, अभिनय या समाचार की तरह–जहाँ वह भीतर से संतुष्ट होता है कि उसका जीवन कम टूटा हुआ है। ऐसी स्थितियाँ बताती हैं कि समाज में करुणा का स्थान धीरे-धीरे आत्मतुष्टि ने ले लिया है। अब हम दुख सुनते नहीं, निहारते हैं–और उसी क्षण, दुःख का साझा करना आत्मीयता नहीं, एक एकांतिक मंच बन जाता है। यही सबसे करुण सच्चाई है – दुःख की गाँठ खुलती है, और कोई और मुस्कुरा उठता है। ~ नवल जाणी
शांगढ़ यात्रा: जब लगा कि स्वर्ग धरती पर ही है “यदि हिमाचल में ही ऐसी अनुपम शोभा है, तो फिर पहलगाम क्यों जाया जाए?” यही विचार मन में तब उदित हुआ जब मैंने पहली बार शांगढ़ के धरातल पर कदम रखा। प्रकृति की गोद में बसा, शांगढ़ नामक यह छोटा-सा ग्राम हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जनपद की सैंज घाटी में स्थित है। यह स्थान अभी तक भीड़-भाड़ से अछूता है, और अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ एक शांत, निर्विकार जीवन का अनुभव कराता है। प्रवेश – हरित मैदानों की गोद में शांगढ़ पहुँचते ही सबसे पहले मन को मोह लेता है एक विशाल हरा मैदान – जिसे स्थानीय लोग शांगढ़ मीडोज़ कहते हैं। यह भूमि केवल देखने में रमणीय नहीं, अपितु स्थानीय निवासियों के लिए पवित्र भी मानी जाती है। मैदान के किनारे स्थित है शांगचुल महादेव का प्राचीन मंदिर, जिसकी लकड़ी और पत्थर से बनी सुंदर नक्काशी इसकी सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है। वहां खड़े होकर चारों ओर फैले देवदार के वन, शुद्ध वायु और नीरव वातावरण आत्मा को विशेष शांति प्रदान करते हैं। प्रकृति प्रेमियों हेतु – ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क यहाँ से सम...
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