जो शेष रह जाए
जो शेष रह जाए -नवल जाणी
नवल जाणी जी की ये पंक्तियाँ प्रेम, अनन्यता और पूर्ण आत्म-समर्पण की एक बेहद सुंदर और भावुक अभिव्यक्ति हैं। इन पंक्तियों में कवि अपने जीवन की सबसे गहरी और अंतिम अभिलाषा को व्यक्त करते हैं, जहाँ वे संसार की नश्वरता और प्रेम की अमरता के बीच के संबंध को स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं।
कवि का मानना है कि इस भौतिक संसार की हर वस्तु, चाहे वह धन-दौलत हो, सफलता हो, आकर्षण हो या फिर यह शरीर स्वयं हो, समय के साथ समाप्त हो जानी है। ऐसे में, जब इस जगत् का सब कुछ नष्ट होने लगे या मिट जाए, तब भी यदि उनके पास कोई एक चीज़ शेष बचनी चाहिए, तो वह केवल उनके प्रिय का साथ होना चाहिए। यहाँ 'साथ' केवल किसी व्यक्ति की शारीरिक उपस्थिति नहीं, बल्कि वह आत्मिक जुड़ाव, भरोसा और अहसास है जो हर स्थिति के पार भी बना रहता है।
इन पंक्तियों में 'अपघटित' शब्द का प्रयोग बहुत ही अर्थपूर्ण और अनूठा है। अपघटन का अर्थ होता है किसी चीज़ का अपने मूल तत्त्वों में टूटकर विलीन हो जाना या गल जाना। कवि सांसारिक वस्तुओं के नष्ट होने की प्रक्रिया को सहज स्वीकार करते हैं। वे जानते हैं कि समय की कसौटी पर दुनिया की कोई भी भौतिक वस्तु टिक नहीं सकती, इसलिए वे किसी भी नश्वर चीज़ को सहेजने का मोह नहीं रखते। वे ईश्वर या नियति से केवल इतनी प्रार्थना करते हैं कि भले ही बाकी सब कुछ घिस जाए, बिखर जाए या मिटकर धूल में मिल जाए, लेकिन प्रिय के साथ का वह अटूट बंधन कभी अपघटित न हो।
यह कविता वास्तव में इच्छाओं के उस चरम स्तर को छूती है जहाँ व्यक्ति की तमाम सांसारिक आकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं तथा केवल शुद्ध प्रेम ही एकमात्र अंतिम सत्य बनकर रह जाता है। जब मनुष्य जीवन के गहन अहसास से गुज़रता है, तब उसे यह समझ आता है कि अंत में रिश्तों और प्रेम की गहराई ही मायने रखती है। कवि की यह निष्काम और निस्वार्थ अभिलाषा दर्शाती है कि सच्चा प्रेम कुछ पाने की शर्त नहीं रखता, बल्कि सब कुछ खो देने के बाद भी केवल प्रिय के 'साथ' के बचे रहने की कामना करता है। नवल जाणी जी ने सरल लेकिन गहराई से भरे शब्दों में प्रेम की इसी अमरता को उकेरा है।
(एक कविता प्रेमी -पाठक की कलम से )
बहुत ही गहरे भाव से परिपूर्ण कविता 👌
जवाब देंहटाएंआपमें सोचने की शक्ति सर्वोच्च स्तर की है, जानकर अच्छा लगा।
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